विशेषांक: कैनेडा का हिंदी साहित्य

05 Feb, 2022

यह प्रश्नचिन्ह क्यों बार-बार? 
क्यों उसे जीत, क्यों मुझे हार? 
यह प्रश्न उठे क्यों बार-बार? 
 
जीवन में जो भी किये कर्म, 
तत्समय लगा था, वही धर्म। 
यदि अनजाने ही हुई भूल, 
लगता जीवन से गया सार॥
 
यह प्रश्न उठे क्यों बार-बार? 
इच्छाओं का तो नहीं अन्त, 
मन छू लेता है दिग-दिगन्त। 
इस मन को ही यदि कर लूँ जय, 
हो जाये कष्टों से निस्तार॥
 
यह प्रश्न उठे क्यों बार-बार? 
क्यों मुझको बनना है विशिष्ट? 
क्यों नहीं काम्य है सहज शिष्ट? 
सब सौंप उसे यह कठिन भार, 
निश्चिन्त रहूँ, पा सुख अपार। 
 
यह प्रश्न उठे क्यों बार-बार? 
क्यों उसे जीत, क्यों मुझे हार? 
यह प्रश्न उठे क्यों बार-बार? 

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

इस विशेषांक में
कविता
पुस्तक समीक्षा
पत्र
कहानी
साहित्यिक आलेख
रचना समीक्षा
लघुकथा
कविता - हाइकु
स्मृति लेख
गीत-नवगीत
किशोर साहित्य कहानी
चिन्तन
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
व्यक्ति चित्र
बात-चीत
ऑडिओ
विडिओ