विशेषांक: इक्कीसवीं सदी की कहानियाँ

इक्कीसवीं सदी की कहानियाँ

आवरण चित्र: श्रेया श्रुति

 

साहित्य कुञ्ज के ‘इक्कीसवीं सदी की कहानियाँ’ विशेषांक के संदर्भ में

सुमन कुमार घई

 

साहित्य कुञ्ज इस सदी के पहले पच्चीस वर्ष पूरे होने के पश्चात पलट कर इस सदी की कहानी की ओर देखने का प्रयास कर रहा है। इस महत्त्वपूर्ण प्रयास का बीड़ा डॉ. आरती स्मित ने उठाया है—वह इस विशेषांक की सम्पादिका हैं। सम्पादन में पूरे निर्णय उनके हैं और मैं इस विशेषांक में केवल तकनीकी सहायक के रूप में उपस्थित हूँ।

डॉ. आरती स्मित के साथ प्रायः साहित्य, समाज और अन्य मानवीय विषयों पर चर्चा होती रही है। अब तो यह भी याद नहीं कि कब और किस समय इक्कीसवी सदी की कहानियों की चर्चा हुई और साहित्य कुञ्ज की ओर से विशेषांक प्रकाशित करने पर सहमति बनी। यह विचार संभवतः डॉ. आरती स्मित का ही था। आशा है  कि आप सभी का समर्थन मिलेगा।

डॉ. आरती स्मित और मैं भली-भाँति इस विशेषांक के महत्त्व को भी समझते हैं और अपनी क्षमता की सीमाओं को भी समझते हैं। एक सदी के एक चौथाई भाग में जनित साहित्य की एक सम्पूर्ण विधा की विशालता को एक विशेषांक में समेट पाना भगीरथ प्रयास है। फिर भी डॉ. आरती स्मित ने इसे सफलतापूर्वक सम्पूर्ण किया है। 

इस विशेषांक को एक भाग में प्रकाशित कर पाना असम्भव है। कम से कम दो अंकों में ही इसे अपलोड किया जा सकेगा। इक्कीसवीं सदी में प्रकाशित लगभग एक सौ रचनाओं और रचनाकारों में कुछ को चुना गया है—इस विधा के पंडितों से लेकर नई क़लम तक को। 

किसी भी युग के काल खण्ड के इतिहास को साहित्य अपने दृष्टिकोण से देखते, समझते हुए परोसता है। यह समझ न तो निर्णायक होती है और न ही अन्तिम। समझने और उसे अभिव्यक्त करने की प्रक्रिया निरंतर चलती है और यह शाश्वत सत्य है। इसी तरह किसी भी विशेषांक को कह देना कि इस प्रकाशन के प्रयास से अतिरिक्त कुछ बचा नहीं है—मात्र भ्रम है। हम लोग कहानी विधा की ऊपरी सतह को केवल खरोंच पाए हैं। दूसरी और हम उत्साहित हैं और प्रसन्न हैं कि हम प्रयास तो कर रहे हैं।

एक बात मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि ‘इक्कीसवीं सदी की कहानियाँ’ विशेषांक में किसी विमर्श विशेष को नहीं चुना गया है। साहित्य कुञ्ज में इन कहानियों को कई किश्तों में प्रकाशित किया जाएगा और हर बार मैं प्रचार के विभिन्न माध्यमों से आप सभी को सूचित करता रहूँगा। 

साहित्य कुञ्ज में इसी विधा के विभिन्न पक्षों पर भी भविष्य में विशेषांक प्रकाशित करने की योजना है। इन विशेषांकों का बीजारोपण हो चुका है। हम आपके परामर्श और प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करेंगे।

सादर—
सुमन कुमार घई
प्रकाशक एवं सम्पादक साहित्य कुञ्ज
 

  कल सुबह मैं स्कूल-ट्रिप पर पैरिस जा रही हूँ; मुझे चिंता है कि मेरी अनुपस्थिति में पापा-मम्मी एक दूसरे से कैसे बात करेंगे? एक महीने से अधिक हो चुका है कि पापा-मम्मी को जो एक दूसरे से कहना होता है, वे मेरे माध्यम से कहते-सुनते हैं। शुरू-शुरू में तो मुझे यह खेल अच्छा लगा था क्योंकि उनके बीच संवाद का ज़रिया मैं थी और इसीलिए वे दोनों मेरी ख़ूब आवाभगत कर रहे थे और मेरी हर बात पर तवज्जो दे रहे थे, चाहे वह कितनी भी बेवुक़ूफ़ी भरी क्यों न हो। किन्तु कुछ ही दिनों के बाद मैं इस खेल से बोर हो गयी क्योंकि अपने अपने छोटे-छोटे पैग़ामों के लिए भी वे मुझे परेशान करते रहते हैं।  कल रात की ही तो बात है; मैं फोन पर अपनी सहेली एप्रिल से गृहकार्य के विषय में बात कर रही थी और मम्मी बार-बार मुझे परेशान कर रही… आगे पढ़ें
  “अक्षत बीच मत्थे पर लगाइव,” ठकुराइन चिल्लाईं। छोटी बहू काँप उठी। उसने सिन्दूर, तेल, हल्दी, कुँए की दूब आदि को थाली में सजाया तथा भोलेनाथ का सुमिरन किया और आँगन में जाकर कलुआ को पतला-सा मगर लम्बा टीका लगाया। तब तक दनदनाती हुई ठकुराइन पहुँची और घुड़कते हुये छोटी बहू के हाथ से थाली छीन ली। ठकुराइन ने एक लम्बा और चटख टीका कलुआ के माथे पर लगाया और ‘‘हर-हर महादेव” का उदघोष किया। हर्ष से पुलकते हुये ठकुराइन ने कहा, ‘‘जा बेटवा!” उनका रोम-रोम अपने बेटे को ‘‘विजयी भव’ का आशीर्वाद दे रहा था। उनका ये बेटा मुल्क की सरहद पर लड़ने नहीं जा रहा था और न ही किसी नौकरी के साक्षात्कार पर जा रहा था। उनका ये बेटा आज गाँव की सबसे प्रतिष्ठित जंग लड़ने जा रहा था। शाम को शंकरजी के थान पर उनके बेटे की क़िस्मत का फ़ैसला जो होना था। दरअसल… आगे पढ़ें
  अचानक चीं ईं . . . ईं करके किसी छोटे स्टेशन पर ट्रेन रुक गई थी। यूँ छोटे स्टेशनों पर इस ट्रेन का स्टॉपेज नहीं था, पर लोग अक़्सर यहाँ उतरने के लिये चेन-पुल कर देते हैं। ट्रेन खड़ी होते ही चाय-चाय की आवाज़ें आने लगीं। मैंने अलसाए भाव से खिड़की से बाहर झाँका, एक चाय वाले को देखकर चौंक गया। उससे नज़रें मिलीं तो उसके चेहरे पर एक परिचित सी मुस्कान दिखी, ‘अरे! . . . ये तो बंसी है शायद,’ मैंने उसे पुकारना चाहा तब तक ट्रेन आगे बढ़ चुकी थी; चाय वाला भी कुछ अचकचाई मुद्रा से मुझे देखता रह गया। मैंने देखा वह वहीं खड़ा लगातार मेरी ओर देखे जा रहा था . . . ट्रेन की गति पकड़ते ही वह एक धब्बे के रूप में तब्दील होते-होते विलुप्त हो गया, मन उलझ-सा गया क्या यह बंसी ही था? अगर बंसी ही था… आगे पढ़ें
  घर में प्रवेश करते ही नज़र अलमारी पर जा रुकी—शर्बत सेट, किताबें, कैसेट्स और न जाने क्या-क्या अबाड़-कबाड़। मन में आया अभी उठाकर सबसे पहले इन्हें बाहर फेंक दूँ। मात्र 5-6 वर्षों में क्या कुछ नहीं बदल गया। कभी ये अलमारी मेरी अमानत हुआ करती थी। क़रीने से रखी किताबें, कार्ड-बोर्ड, स्केच पेन, पेंट की शीशियाँ, ख़ूबसूरत तसवीरें, डायरी, मेरा मनी बैग, शो पीस और ढेर सारी लुभावनी चीज़ें। किसी की हिम्मत नहीं होती मेरी अलमारी छूने की। हमेशा ताला बंद रहता और चाभी मेरे हाथ में होती। ससुराल जाते वक़्त सख़्त हिदायत देकर गई थी, “मेरी अलमारी के सामानों को इधर-उधर नहीं करना।” आज वही अलमारी अपने बदले रंग-रूप में मुँह चिढ़ा रही थी मुझे। चाय पीकर घर का कोना-कोना देखने की तीव्र लालसा रोक नहीं पाई। पापा के कमरे में जाले लगे थे। उनका स्टडी-टेबल धूल-गर्द से मढ़ा हुआ था। परदे के गाढ़े रंग भी… आगे पढ़ें
  “बाबूजीऽऽऽऽऽ . . .”  उसकी आवाज़ में तल्ख़ी थी। वह चीखकर बोला था। बोलते समय उसके ओंठ काँपे थे। चेहरे पर तनाव की परछाइयाँ साफ़ देखी जा सकती थीं। वह तमतमाया हुआ था। उसकी तर्जनी बाबूजी के तरफ़ तनी हुई थी। “बाबूजी . . . बस! बस बहुत हो चुका। जितना कहना था . . . कह चुके। हमें अब समझाने की ज़रूरत नहीं। बहुत समझा चुके आप। अब हम बच्चे नहीं रहे . . . हमें अपनी ज़िन्दगी अपने हिसाब से जीने दें . . .” रामप्रसाद का चेहरा फक पड़ गया था। आवाज़ गले में फँसकर रह गयी थी। मुँह खुला रह गया था। वे अवाक्‌ थे। अजय के चेहरे पर क्रोध की परतों को कुरेदकर देखने लगे थे। मन में विचारों का तूफ़ान उठ खड़ा हुआ था। अंदर सब क्षत-विक्षत था। नज़ारा देखते हुए वे सोचने लगे थे। अजय में इतनी हिम्मत कहाँ से… आगे पढ़ें
  ख़ून को जला देने वाली जून की तपती दुपहरी। लोगों के शरीर से पसीना चूह रहा था। दिल्ली रेलवे स्टेशन पर बैठी लाजो अपने गाँव जाने वाली गाड़ी की प्रतीक्षा कर रही थी। उसके मुर्झाए हुए चेहरे को देखकर कोई भी कह सकता था कि वह बहुत परेशान है। वह किसी गहरी सोच में डूबी हुई थी। उसके कानों से किसी की थकी हुई आवाज़ टकराई।  “भई, अपने बीबी-बच्चों के लिए पसीना नहीं बहाएँगे, तो किसके लिए बहाएँगे?”  सोच की गहरी खाई से निकलकर लाजो ने आवाज़ की तरफ़ देखा। दो पतले-दुबले अधेड़ आदमी लकड़ी के बड़े ठेलों पर लदे भारी सामान को कंधे से खींचकर माल गोदाम की तरफ़ ले जा रहे थे। गर्मी में भारी ठेलों को खींचना मुश्किल हो रहा था फिर भी दोनों पूरी ताक़त से ठेलों को खींच रहे थे। एक तो चिलचिलाती धूप ऊपर से गर्मी का मौसम। दोनों पसीने से… आगे पढ़ें
  जैसै–जैसे दिन चढ़ता जा रहा था, चौधरी दीनबंधु की ऊबन बढ़ती जा रही थी। वे कभी बाहर निकलकर टोह ले रहे थे, तो कभी मन बहलाने के लिए छत पर चले जा रहे थे। कभी मन ही मन नौकर सोमारू को कोस रहे थे कि अभी तक वह कोई ख़बर क्यों नहीं लाया। वे पिछले दो दिनों से ज़नानी बखरी में पड़े हुए थे क्योंकि उनकी बैठक में रुस्तम मियाँ की बेटी नफ़ीसा की बारात रुकी हुई थी। वे बार–बार बाहर आकर पता लगाने की कोशिश कर रहे थे कि उनके मवेशी कैसे हैं। वे अपने मवेशियों से बहुत लगाव रखते थे। उनके पास एक जर्सी और दो साहिवाल गाएँ थीं। चार बैल और दो बछड़े थे। एक भैंस भी थी। एक साहिवाल और भैंस दुधारू थीं। चौधरी साहब को घोड़ा पालने और घुड़सवारी का भी शौक़ था। उन्होंने दो काठियावाड़ी घोड़े भी पाल रखे थे। उनके… आगे पढ़ें
  “मैम, क्या करूँ? मेरा बच्चा छह महीने का है, कमज़ोर है, अब तक न बोतल से दूध पीना सीखा है न किसी और के पास रहता है।” उस तरफ़ से फोन पर रुआँसी आवाज़ थी। “छुट्टी लेकर घर बैठो, परेशान मत हो,” इधर से सलाह मिली।  “हाय मैम। छुट्टी कैसे लूँ? छुट्टी के नाम से डिपार्टमेंट में सबकी भौंहें टेढ़ी हो जाती हैं,” उधर से डरी हिचकिचाती आवाज़ आई।  “मेरा भी बेबी छोटा है, मैंने ली है न,” आत्मविश्वास से भरपूर आवाज़ में जवाब आया।  “मैम, मेरे यहाँ नेफ़्रोलॉजी (किडनी रोग) में अधिकांश सहयोगी डॉक्टर पुरुष हैं। छुट्टी की बात पर सब ऐसे घूरते हैं जैसे कोई भयानक अपराध कर दिया हो। कमेंट करते हैं ‘काम नहीं करना होता है इन डॉक्टरों को, छुट्टियाँ लेकर बैठ जाती हैं, ये महिलाएँ भी क्या रिसर्च करेंगीं’। “मैम, करियर, प्रमोशन, सुख-चैन सब कुछ दाँव पर लगा रहता है। आप का… आगे पढ़ें
  प्रोन्नति की ख़ुशी में मैं और मेरा परिवार मगन ही था तभी विभाग द्वारा स्थानान्तरण की सूची जारी कर दी गई। उस सूची के अनुसार मेरा स्थानान्तरण बड़ोदरा प्रधान कार्यालय हो गया था और मुझे एक सप्ताह के अन्दर नई नियुक्ति पर पहुँचना था। इसकी जानकारी होते ही हम लोगों की प्रसन्नता धूमिल हो गई थी। ख़ैर! नौकरी की है तो आदेश का अनुपालन तो करना ही पड़ेगा, यही सोच कर भोपाल प्रधान कार्यालय से कार्य मुक्त होने पर मैं सपरिवार बड़ोदरा पहुँच गया। बड़ोदरा प्रधान कार्यालय में रिपोर्ट करने पर मुझे भरूच ज़िले की जंबूसर शाखा में नियुक्ति का आदेश पकड़ा दिया गया। विवश मुझे सपरिवार जंबूसर क़स्बे के लिए प्रस्थान करना पड़ा। जंबूसर क़स्बे में एक दिन बाज़ार में सब्ज़ी ख़रीदते समय मुझे घनश्याम दिखाई पड़ा। मैं जब इन्टरमीडिएट की परीक्षा पास करने के बाद जहानाबाद में रह रही अपनी मौसी के घर पर रह… आगे पढ़ें
    इस आवाज़ के कई तरह से मायने लगाए जा सकते थे। मानों कोई अँधेरी, गहरी खाई से आवाज़ दे रहा हो। हल्की, कातर और सुन लिए जाने की उम्मीद से भरी हुई। मुझे यक़ीन नहीं हो रहा था। उसने फोन करके इतना कातरता से बुलाया था कि मुझे लगा कोई इमरजेंसी हो गई हो। मैं अपने स्टुडियो में बैठ कर पेंट कर रही थी। किसी अनजान स्त्री का बदहवास पोट्रेट बना रही थी। उसकी आखों के पास स्याह डोरे डाल ही रही थी कि मोबाइल घनघना उठा था। मैंने ब्रश वहीं छोड़ा, एप्रिन उतारा और दौड़ती हुई उसके घर की तरफ़ जा रही थी। वो मेरे अपार्टमेंट के पीछे एक बड़ी-सी कोठी में रहती थी। वो अमीरों की नयी-नयी बसी हुई कॉलोनी थी। पैदल का रास्ता मैंने लगभग दौड़ते हुए तय किया था। मेरे लिए ये हैरानी की बात थी। इतनी चंचल, बिंदास, हँसोड़ स्त्री का… आगे पढ़ें
  हर साल की तरह इस साल भी 19 मई को रोशनी की बेटी कलि ने अपनी माँ को नैनीताल की फ़्लाइट टिकट ईमेल पर भेज दिया। 21 तारीख़ सुबह की फ़्लाइट थी। पिछले पाच सालों से रोशनी ने मई महीने का यह आख़िरी हफ़्ता कहीं एकांत में बिताने का निर्णय लिया है। वह कहाँ जाती है, क्यों जाती है वह एक रहस्य है। उसके जीवन का एकमात्र हमराज़ सिर्फ़ उसकी बेटी कलि है। अपनी माँ के साथ उसका एक अलग प्रकार का लगाव है। वे दोनों माँ-बेटी कम और सहेली ज़्यादा थीं।  रोशनी किसी को इस एकांतवास का हिस्सा नहीं बनने देना चाहती थी क्योंकि तमाम टुकड़ों में बँटते-बँटते, उसने अपना एक हिस्सा कहीं पर सुरक्षित रख दिया था। यह उसकी ज़िंदगी का वह हिस्सा था जिस पर केवल उसका अपना अधिकार था। एक समझदार पत्नी, माँ, बहन, बेटी, बुआ और अनंत रिश्तों को बख़ूबी निभाने वाली… आगे पढ़ें
  गायत्री का मन तो जैसे बल्लियों उछल रहा था। यह सोच-सोचकर फूली नहीं समा रही थी कि “एक ही बेटा है लेकिन है लाख़ों में एक! ऐसा आस-पास कहाँ किसी का बेटा दिखता है जिसकी माँ उसपर इस तरह नाज़ कर पाए, किसी का बेटा ऐसा नहीं है जो इतना श्रवण हो और जो अपनी माँ का इतना ख़्याल रखता हो! आज अयान के पापा होते तो देखते अपने बेटे को कि शादी हो जाने के बाद भी एक बेटा अपनी माँ का किस तरह ख़्याल रखता है। उनका सारा सिद्धांत धरा-का-धरा रह जाता। हमेशा बेटी के नहीं होने का मातम करते रहते थे। गायत्री को याद आ रहा था कि किस तरह वे हज़ारों बार यह जुमला बोलते रहते थे, “बेटा तभी तक बेटा होता है जब तक कि उसकी शादी नहीं हो जाती, लेकिन एक बेटी जीवन-भर बेटी रहती है,” और इसीलिए वे एक बेटी… आगे पढ़ें
  सुजाता और मनोज में आज दो-तीन दिनों से झिकझिक हो रही है। ये दोनों अपने शहर से बहुत दूर हैदराबाद में रहते हैं, अपने छोटे से फ़्लैट में। फ़्लैट अपना है। दोनों ही नौकरी में हैं। मनोज यहीं किसी सॉफ़्टवेयर कंपनी में इंजीनियर है, और सुजाता भी इसी कंपनी में डेटा ऑपरेटर है। तीन साल पहले दोनों की शादी हुई है – लव मैरिज। दोनों विवाह से पहले ही नौकरी पर हैं। यह फ़्लैट विवाह के बाद लिया गया है। इसका किश्त अभी भी चल रहा है। मनोज के पिता जी आने वाले हैं। मनोज की माँ नहीं हैं, कोई दस वर्ष पहले गुज़र गईं। पिताजी कॉलेज में प्रोफ़ेसर थे, पिछले साल ही रिटायर हुए हैं। बेटे के यहाँ पहली बार आ रहे हैं। पिताजी ने कोई आठ दिन पहले ही अपने आने की सूचना मनोज को दे दी थी। मनोज ख़ुश है कि पिताजी आ रहे… आगे पढ़ें
  जीवन भर जिन बच्चों के लिए नमिता संघर्ष करती रही, उन बच्चों के व्यवहार से इतनी उपेक्षा मिली कि नमिता ने अपनी ममता के ख़िलाफ़ जाकर उन्हें त्याग दिया और आहत होकर एक कठोर फ़ैसला ले लिया।  नमिता ने काँपते हाथों से घर का ताला खोला और अंदर गई। भँवर में फँसी नाव की तरह विचारों की नाव में डोलती वह कुर्सी पर बैठ गई। आज उसका शरीर और मन थक कर चूर हो चुका था। बरामदे की मुँडेर पर जाती हुई धूप की किरणें मस्त हवा के साथ गुफ़्तुगू कर रही थीं। प्रकृति की रम्यता नमिता को हमेशा ही सुकून देती रही है। पर आज नमिता का मन और शरीर मानव विडम्बनाओं के झंझावात पर उलझ गया था।  आज वह सोचती है कि मनुष्य जीवन भर किस तरह झूठे रिश्ते-नातों, मान–अपमान के बीच झूलता रहता है। वह क्यों नहीं समय रहते इस संसार की नश्वरता को… आगे पढ़ें
  लंबी धूसर दाढ़ी, मेंहदी से रँगे लाल बाल, चौड़ी पेशानी पर उतरती कुछ घुँघराली लटें, बड़ी-बड़ी आँखें और नीचे को झुकी तोतई नाक। उजला रंग और उजले ही कपड़े पहने यही थे रहमान कबाड़ीवाले। ठीक नौ बजे वे घर से हाथठेला लेकर निकल जाते और ‘कबाड़ दे दो, कबाड़’ की आवाज़ लगाते हुए गलियों में चल पड़ते। गर्मी हो, सर्दी हो या बरसात, रहमान का यह रोज़ का नियम बन चुका था। पूरा शहर तो नापा नहीं जाता था, पर रोज़ तीन-चार कॉलोनियों में फेरी लगा ही लेते थे। आसपास के बच्चे नौ बजे घर से बाहर निकलकर रहमान के ठेले का इंतज़ार करते थे। इसलिए नहीं कि वे कबाड़ बेचना चाहते थे, वरन फेमू को देखना चाहते थे, उससे दुआ-सलाम करना चाहते थे। ‘फेमू’ भी बच्चों की चंचलता देखकर फुदकने लगता। बच्चे उसे गली के आखिरी छोर तक छोड़ते, फिर वह रहमान के साथ निकल पड़ता।… आगे पढ़ें
  किसी भी देश के सरहदी इलाक़ों का वातावरण उसके बाक़ी इलाक़ों से एकदम अलग होता है। सीमा दर्शाने वाले चिह्न, दोनों तरफ़ सैनिकों की तैनाती, दिन-रात लगातार चलने वाली गश्त, सैनिकों के तंबू, जहाँ-तहाँ खड़े सशस्त्र सैनिक, पल-पल की चौकसी, इसे यक़ीनन अलग ही रूप प्रदान करती है। थोड़ा सा भय भी इन सब में शामिल हो जाता है।  सीमा का यह क्षेत्र बाक़ी सीमावर्ती क्षेत्र के मुक़ाबले कुछ शांत समझा जाता था। यहाँ घुसपैठ की घटना ना के बराबर थी। सीमा पार से गोलीबारी कभी नहीं होती थी। हथियारों व नशा तस्करी की समस्या भी नहीं थी, इसलिए यहाँ काँटेदार तारों की बाड़ भी नहीं लगाई गई थी।  दूसरे सीमावर्ती क्षेत्रों से यदा-कदा गोलीबारी, घुसपैठ के समाचार आते रहते थे। सैनिकों व संतरियों की मौत होने की सूचना होने के बावजूद यह इलाक़ा किसी तरह भी अशांत नहीं था।  छह साल दूसरे स्थान पर तैनात रहने… आगे पढ़ें
  प्रातः सैर से वापस आने के बाद पापा ने चाय पीते हुए डाइनिंग टेबल पर पड़े, आज के अख़बार को बेटी मालविका के सामने खिसका दिया। मालविका की नज़र हेड लाइन पर गई “रिटायर्ड अधिकारी को किया साइबर अरेस्ट, साइबर पुलिस की तत्परता से बाल-बाल बचे, हड़पे गए 10 लाख रुपये भी बरामद।” उसने पढ़ते ही पापा की ओर देखा, वे उसे देख मुस्कुरा रहे थे। मालविका देर रात तक काम करने में लगभग अभ्यस्त थी। रात 12 की सूई क्रॉस कर गई, ऑफ़िस को लॉग आउट कर थकी-सी अपने रूम से बाहर निकली, सोचने लगी, किचन में जाकर कुछ पेट-पूजा कर ली जाय, ‘मिल्क, कुछ बिस्किट या नट्स’ ले लिए जाएँ। मोबाइल ईयर बड पर अपने पसंद का म्यूज़िक सुनते हुए, मालविका ने किचन से कप में मिल्क लिया तथा दूसरे हाथ में नट्स की प्लेट थामे, किचन के बाहर निकली। उसने डाइनिंग टेबल पर यह… आगे पढ़ें
  चैटर्जी लेन का यह सबसे पुराना, दो तल्ला मकान होगा जिसे समय के साथ नया नहीं कराया गया। नीचे-ऊपर मिलाकर लगभग दर्जन भर कमरे। रसोई, बरामदा अलग। और सबसे बड़ी तो यह पिछवाड़े की बाड़ी . . . मेरे होंठों पर हल्की मुस्कान उभर आई। हाँ, ये लोग इसे बाड़ी ही कहते हैं। जब नई-नई ब्याह कर आई थी और पहली बार ये शब्द सुना तो बहुत अचरज हुआ। “बाड़ी? ये क्या होता है?” तब राघव मुझे पीछे वाली सीढ़ियों से नीचे ले गए, “ये है बाड़ी।” “अरे बाप रे, ये जंगल?” “कम-से-कम जंगल तो मत कहो!” राघव ने आपत्ति जताई थी। अच्छी-ख़ासी जगह थी, पाँच-छह कमरों लायक़। बहुत तरह की लताएँ एक-दूसरे से लिपटी पड़ी थीं। एक तरफ़ आम तो दूसरी तरफ़ अमरूद के पेड़ लगे थे। पेड़ पर लटकता हुआ कटहल तो मैंने पहली बार ही देखा था। “जंगल शब्द से आपत्ति है, तो सघन… आगे पढ़ें
  इतने वर्षों बाद आज उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। इसी समय की तो प्रतीक्षा थी उन्हें कि वे अपने बचपन और जवानी के चिर-परिचित शहर में लौटें जो न जाने कब से उनका इंतज़ार कर रहा होगा। वहाँ की सड़कें, घुमावदार गलियाँ, भीड़ भरे इलाक़े, टमटम, इक्के, रिक्शे, साइकिल की घंटियाँ और जगह-जगह लोगों के जमावड़े। शाम को होने वाली गोष्ठियाँ, क़हक़हे, बिंदास असहमतियाँ और निरंतर कुछ सुनने-सुनाने की एक परम्परा। एक छोटा-सा शहर जहाँ लोग प्रायः पैदल चलना पसंद करते हैं। बस थोड़ी-सी सड़कें, बाज़ार, कुछ मंदिर, कुछ पुराने अवशेष, एक गिरिजाघर, कुछ कोठियाँ और बस। उन्हें याद है कि बचपन में इन्हीं सड़कों पर गर्मी के दिनों में पानी के फव्वारे छोड़े जाते थे या भिश्ती अपनी मशकों से पानी गिराता हुआ चला करता था। इससे सड़कें एकदम धुलकर साफ़ हो जाती थीं। तब जगह-जगह सरकारी लैम्प-पोस्ट लगे होते थे जिन्हें हर शाम रोशन… आगे पढ़ें
  आज बाज़ार से घर जाने के लिए रिक्शे में बैठी तो अनजाने नंबर से एक फोन आया। न चाहते हुए भी उठा लिया। उधर से इंतिखाब सर बोल रहे थे। “मैडम कहाँ हो आजकल?” सर का फोन आता है तो स्वतः ही सकारात्मकता रक्त में प्रवाहित होने लगती है। बाज़ार की भीड़भाड़ से जितना परेशान हो गई थी। रिक्शे वाले पर भी झुँझलाहट सी हो रही थी, वो सब ग़ायब हो गई।  “घर आई हुई हूँ, सर। छुट्टियाँ चल रही हैं ना। फिर पूरे साल निकलना हो नहीं पाता है। आप बताएँ, क्या सहायता कर सकती हूँ?”  सर से जब भी कभी बात होती तो पहला सवाल और पहला जवाब यही होता था। सर किसी और से भी बात कर रहे थे शायद, थोड़ी देर जवाब नहीं आया। मैं फोन कान से लगाए हुए ही रिक्शे से उतर गई। दूसरे हाथ से पर्स में हाथ डालकर रिक्शे… आगे पढ़ें
  सुबह की चाय पीते हुए मीठी आवाज़ में संध्या ने बेटे से पूछा, “ऑफ़िस कितने बजे जाना है?”  उत्तर मिला, “वही 9:00 बजे माँ!”  “ऑफ़िस में सब ठीक चल रहा है ना?” माँ ने बात आगे बढ़ाते हुए पूछा।  “सब बढ़िया है माँ!” यह कहते हुए बेटे ने संवाद को विराम देने की कोशिश की। इससे पहले कि माँ कुछ और पूछती, बेटे के चेहरे के भाव ने उसे संदेश दे ही दिया, “बस . . . माँ और प्रश्न नहीं।” उस दिन शायद माँ का बात करने का ज़्यादा ही मन था, तभी तो बेटे के चेहरे के भाव को अनदेखा करते हुए वह बोली पड़ी, “अपना ध्यान रखना बेटा, गर्म कपड़े पहन कर बाहर निकलना, और हाँ . . .”  तभी बेटा भड़क कर उठ खड़ा हुआ। झल्ला कर बोल पड़ा, “अब बोलोगी यह करना . . . वह मत करना . . . तंग… आगे पढ़ें
  तूने आज फिर मुझे रुला दिया कल्ली। अपनी पच्चीस बरस की नौकरी में तेरी जैसी न जाने कितनी छोरियाँ इस बाल सुधार गृह में आईं  और चली गईं । लेकिन तूने तो पहले दिन से ही . . . ऐसा किया जिसे कोई नहीं भूल सकता। चोरी-चकारी, मारपीट, हुल्लड़बाजी, गाली-गलौच और फिर तो जेब-कतरी, भीड़-भाड़ में सामान चुराने वाली तू न जाने कितने अपराधों में लिप्त जब इस सुधार केंद्र में लाई गई तो वही हँगामा, खाने की थाली फेंक देना, साथी छोरियों से मारपीट करना। ऐसा कोई नहीं जिसकी नाक में तूने दम ना किया हो। पहले ही दिन तूने सारी हदों को पार कर दिया। जब  समझाने पर मेरी बाजू को काट लिया—पूरे के पूरे दाँत उभर आए थे और ख़ून बहने लगा। मैं दर्द के मारे चीख उठी और रोने लगी।  सारे बच्चे जो मेरी आँख के इशारे से डरते थे और मेरी एक… आगे पढ़ें
   “मम्मी, पापा और भैया छुट्टी के दिन भी सुबह-सुबह तैयार होकर कहाँ गये हैं?” नेहा पूछ बैठी। माँ ने सरलता से उत्तर दिया, “तेरे विवाह के लिए लड़का देखने गये हैं।”  “माँ मुझे आगे पढ़ाई करनी है। मैं अभी विवाह नहीं करूँगी,” दुःखी स्वर में नेहा बोली।  माँ ने प्यार से कहा, “बेटा, हम जो भी कर रहे हैं, तेरी भलाई के लिए ही कर रहे हैं। आ जा! अब नाश्ता कर लें।” “बस, आज से मेरी भूख हड़ताल है। मैं कुछ भी नहीं खाऊँगी,” यह कहकर खीजते हुए नेहा अपना कमरा बन्द करके पड़ गई।  नेहा के पापा और भाई रवि बहुत ख़ुशी-ख़ुशी घर आये क्योंकि नेहा के लिए यह लड़का उन्हें बहुत पसन्द आया। रवि ने पूछा, “माँ नेहा कहाँ है?”  माँ द्वारा नेहा का हाल बताने पर रवि कमरे में जाकर नेहा को समझाने लगा, ”नेहा, लड़का बहुत अच्छा है देखने में और व्यवहार… आगे पढ़ें
    पूजा की छुट्टियों में घर लौटा हूँ और आज वह अपने सवालों के लिए चली आ रही है। मैंने उसे दूर से ही आते देख लिया है। हाथ में ठिगनी लाठी के सहारे झुकी हुई कमर को खड़ी होकर कभी सीधी करती है और फिर झुककर चल देती है। वही पैवंद लगी मैली-कुचैली धोती, बिना तेल के उलझे उजले बालों के बीच ग़मगीन झुर्रिदार चेहरा। यह काकी माँ है। आते ही वही पुराना सवाल जड़ देगी . . . क्या, हरिया अब नहीं लौटेगा अमर? कैसे बदल गया है कि अपने गाँव-गिरन की भी याद नहीं आती है उसे? मैं बूढ़ी हो चली, आँखों से दिखाई नहीं पड़ता। किसी तरह काम-काज कर लेती हूँ। न जाने भगवान के यहाँ से कब बुलावा आ जाए और हरिया है कि घर आने का नाम ही नहीं ले रहा है। नाती-पोते तो क्या, बहू को भी देखने के लिए… आगे पढ़ें
  सुबह का सूरज बाँस भर चढ़ आया था। शरद की गुनगुनी धूप थी। पूस मास चल रहा था। सप्ताह भर से ठंड का ऐसा क़हर था कि कंबल-रजाई से बाहर निकलने का मन नहीं होता। देर से निकला था सूरज। बच्चे बाहर खेल रहे थे। गाँव में घर से सटे बाहर खलिहान होता है। उसी खलिहान पर बच्चे धूप का आनन्द ले रहे थे। अभी-अभी बस चार दिन पहले लाय-मूढ़ी का पर्व मकर संक्रांति बीता था, इसीलिए बच्चे तिल और मूढ़ी का लाय भी खा रहे थे। इस पर्व में गुड़ से बना यह लाय ग़रीबों की मिठाई के रूप में प्रसिद्ध है। तभी एक छोटे से बच्चे का रोना सुनकर दादी बाहर आई। किसी ने उसके हाथ से लाय छीन लिया था। दादी ने बच्चे से पूछा, “काहे को रो रहे हो तुम संटू बेटा?”  “दादी मेला लाय . . .” वह पूरा बोल नहीं सका।… आगे पढ़ें
जन्मोत्सव  दीवार पर टँगी ढोलकी को उतार उसकी रस्सियाँ कसने में निमग्न चंपा बहुत हड़बड़ाहट में थी। दोनों पैर फैलाकर बैठी चंपा उसकी रस्सियाँ कसती जाती, दो-चार हाथ ढोलकी पर मार आवाज़ पर ग़ौर करती जाती। जब वह ठीक हो गई, उस पर थाप मार उसे एक किनारे रख दिया।  “हूँ! अब ठीक है।” बुदबुदाकर वह अपने सिंगार-पटार में व्यस्त हो गई।  गुलाबी साड़ी को अपने पैबंद लगे हरे साये के ऊपर लपेटा, छोटे बालों में नक़ली चोटियाँ लगाकर लाल फुँदने लगाए। चोटियों को झुलाती हुई आईने के सामने जा खड़ी हुई। आईने के ऊपर रात को उतारकर चिपकाई गई रमोला बिंदी खिलखिला रही थी।  उसे उखाड़कर अपने भवों के बीच चिपका दिया। अब चूड़ियों की बारी थी। उसे नित नई चूड़ियाँ बदलना अच्छा लगता है।  अपने मर्दाने हाथों में हरी-गुलाबी चूड़ियाँ डालने की कोशिश की तो दो-चार टूट कर बिखर गई . . . छुन . .… आगे पढ़ें
  आधुनिक संचार व्यवस्था के समय में हस्तलिखित पत्र तो पुरातत्त्व विभाग में सुरक्षित रखे जा रहे, महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ों का एक अंग बनकर रह गए हैं। जब विज्ञान ने सुविधाएँ उपलब्ध करवाई हैं तो उसका लाभ क्यों न लिया जाए। ऐसे में हस्तलिखित पत्र देखकर आश्चर्य और जिज्ञासा हुई। आगे-पीछे पलटने के बाद पता चला कि यह तो मेरे बचपन के मित्र का पत्र है! कभी-कभी हम लोग दूरभाष के माध्यम से एक-दूसरे के समाचार जान लेते हैं पर यह लंबा-सा व्यक्तिगत पत्र देखकर मैं मन में उफनती जिज्ञासा को रोक नहीं पा रहा था। आख़िर इसमें ऐसा क्या है जो हम फोन पर बात करते समय एक-दूसरे को नहीं बता सकते थे।  पत्नी चाय लिए बैठी थी कि पहले चाय पी लो, पत्र कहीं भागा नहीं जा रहा। पर मैं उसकी बात अनसुनी करके पत्र पढ़ने में मगन था। अब पत्र में लिखी मित्र की उलझन मन-मस्तिष्क… आगे पढ़ें
प्रकाशन वर्ष 2012, (हरिगंधा, पंचकूला)   ‘छोटी-सी सरकारी नौकरी में क्या होता है? दो बच्चों को पालने की ज़िम्मेदारी के बोझ तले दबा आदमी मेट्रो सिटी में रहते हुए ऊँचे ख़्वाब देख सकता है भला? पर चलो, मेरे सिर पर छत तो है। साठ का होने तक मुझे कौन हिला सकता है? रिटायरमेंट के बाद ही सोचूँगा।’ “साब! उतरना नहीं क्या आज? आपका स्टॉप आ गया है।” कंडक्टर ने उसे झंझोड़ा तो उसके विचारों की गाड़ी को ब्रेक लगी। वह सीट से उठा और बस से नीचे उतर गया। मरे क़दमों से घर की ओर चल पड़ा। विचारों की रेल पुनः गति पकड़ने लगी।  ‘आज फिर सुननी पड़ेगी उसकी चपर-चपर। पता नहीं क्या हो गया है उसे? अच्छी भली दाल-रोटी खा रहे थे। भौतिक सुखों की चाहना करके आदमी कहाँ ख़ुश रह सकता है? इस चाहना का पेट बहुत बड़ा है, जितना भरो, उतना ख़ाली का ख़ाली। सब-कुछ… आगे पढ़ें