दिल से ग़ज़ल तक

दिल से ग़ज़ल तक  (रचनाकार - देवी नागरानी)

111. आज़ादी के परवाने

 

सुनो सुनो ये गाथा लोगो
आज़ादी के परवानों की 
“भारत देश की आज़ादी” हाँ 
नारा सब का एक यही था 
भिन्न भिन्न थी जाति जिनकी 
भिन्न भिन्न था धर्म उनका 
लक्ष्य मगर था एक सभी का 
“भारत छोड़ो, भारत छोड़ो’ 
माँग यही इक उनकी थी, जो 
माँग रहे मिल भारत वासी
आख़िर हुई आज़ादी हासिल, 
कहलाए तब सब हिंदुस्तानी। 
 
जुदा हुए फिर आपस में 
नेता बनना लक्ष्य रहा 
खाधी का कुरता पैजामा
पहने नेता जैसी टोपी
स्वार्थ मुनाफ़ा, पदवी ‘देवी’
रिशवत खोरी, सौदे बाज़ी
भूल सभी आदर्श, अहिँसा
ख़ून की प्यास लिए बैठे कुछ 
बढ़ी थी खाई दिल-दिल की
छाए बादल ज़ुल्म सितम के 
देश का बँटवारा अनिवार्य था 
 
आहुति देने को तत्पर 
गाँधीजी जी थे, पर मनमानी 
एक न मानी। 
उठो जवानो आज सँभालो
आन बान तुम अपने घर की

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