दिल से ग़ज़ल तक

दिल से ग़ज़ल तक  (रचनाकार - देवी नागरानी)

90. मेरे वतन की ख़ुश्बू 

 

बादे-सहर वतन की, चंदन सी आ रही है
यादों के पालने में मुझको झुला रही है
 
ये जान कर भी अरमां होते नहीं हैं पूरे 
पलकों पे ख़्वाब ‘देवी’ फिर भी सजा रही है
  
कोई कमी नहीं है हमको मिला है सब कुछ
दूरी मगर दिलों को क्योंकर रुला रही है 
 
कैसा सिला दिया है ज़ालिम ने दूरियों का
इक याद आ रही है, इक याद जा रही है
 
पत्थर का शहर है ये, पत्थर के आदमी भी
बस ख़ामुशी ये रिश्ते, सब से निभा रही है
 
शादाब मेरे दिल में, इक याद है वतन की
तेरी भी याद उसमें, घुलमिल के आ रही है
 
‘देवी’ महक है इसमें, मिट्टी की सौंधी सौंधी
मेरे वतन की ख़ुशबू, केसर लुटा रही है

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