दिल से ग़ज़ल तक

 
वहीं परदेस से लाती सबा दिलदार की ख़ुशबू
मेरी साँसों से आती है वतन के प्यार की ख़ुशबू
 
कहा किसने इन कोरे काग़ज़ों से कुछ नहीं मिलता 
लिखी तहरीर पढ़ने से मिले किरदार की ख़ुशबू
 
दिले-मासूम को बादे-सबा ने आके समझाया
कि है इन्कार में भी प्यार के इक़रार की ख़ुशबू
 
झलकता है दिखावा ही दिखावा उसकी बातों में
करे जो बात दिल से तो मिले गुफ़्तार की ख़ुशबू
 
कभी इनकार करता दिल, कभी इक़रार करता दिल
अजब उस प्यार से आती है अब इज़हार की ख़ुशबू
 
कभी ऐसा भी होता है पराये अपने लगते हैं
मिली है एक बेगाने में जिगरी यार की ख़ुशबू
 
उधर घनघोर सावन की घटा छाई बरसने को
इधर मदहोश करती आई है मल्हार की ख़ुशबू
 
बसी ‘देवी’ है जिसकी छवि, मनोहर मेरी आँखों में
वो आकर काश, फैलाये यहाँ शृंगार की ख़ुशबू

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