दिल से ग़ज़ल तक


(तरही)
212    212    212    212 
 
“इन चरागों को जलना है अब रात भर”
आँच में उनको गलना है अब रात भर 
 
रात दिन कुछ इशारे दे क़ुदरत हमें
उन इशारों पे चलना है अब रात भर
 
नीम बेहोशी भी इतनी तो अच्छी नहीं
होश रहते सँभलना है अब रात भर
 
फ़लसफ़ा ज़िंदगी का समझ लीजिए 
उस समझ में ही ढलना है अब रात भर 
 
ज़िन्दगी एक जलती चिता ही तो है    
जागकर ही पिघलना है अब रात भर
 
ये जो पेचीदा संसार का जाल है 
करके कोशिश निकलना है अब रात भर
 
कैसे कह दूँ कथा इन चराग़ों की मैं 
इनको ‘देवी’ यूँ जलना है अब रात कर
 

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