दिल से ग़ज़ल तक

 

212    212    212    212 
 
फिर तो सब राज़ होंगे अयाँ देख लो 
अपने भीतर वो रौशन जहाँ देख लो 
 
जिन ज़मीरों में ज़िंदा है इंसानियत 
उनकी धड़कन में सारा जहाँ देख लो 
 
जिन चराग़ों में है रौशिनी अब तलक
तेल बाती बिना वो निशाँ देख लो 
 
दीन ईमान की कर न बातें यहाँ
है जो टक्साल भीतर निहाँ देख लो 
 
दिल के गुलशन में ‘देवी’ खिले जो सुमन 
उनकी ख़ुशबू में वो बाग़बाँ देख लो

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