दिल से ग़ज़ल तक

 

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वह किसी का भी क़र्ज़दार न था
इसलिए भी वो शर्मसार न था

 

थी तो महफ़िल वो शायरों की मगर 
उनमें मेरा कोई शुमार न था

 

सुनना जो चाहते थे लोग कहा 
सच भी कहने का अख़्तियार न था

 

सुन लिए बेवफ़ाई के क़िस्से 
एक भी उन में यादगार न था

 

देखी आँखों से, बात सच मानी 
दिल को फिर भी क्यों एतबार न था

 

चूके कितने निशाने पहले भी 
उसका ये आख़िरी तो वार न था

 

मर मिटा सादगी पे ऐ ‘देवी’ 
कह दूँ कैसे वो होशियार न था
 

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