दिल से ग़ज़ल तक

 

2122    1212    22
 
बाग़ में उनका तो शुमार न था 
संग फूलों के कोई ख़ार न था
 
आई आकर वो फिर से लौट गई
थी खिजाँ, मौसम-ए बहार न था
 
लौटा देने के थे तकाज़े बहुत
उसको, जिसने लिया उधार न था
 
तोड़ा जिसने भरोसा था मेरा
उसको मुझपर ही ऐतबार न था
 
बात सच्ची थी पर लगी दिल को
फिर भी पाया कोई करार न था
 
वो सफलता की सीढ़ी चढ़ तो गया
पर उतरते समय उतार  न था
 
दिल की हर बात पर भरी हामी
कैसे कह दूँ वो मेरा प्यार न था
 
बीच मिलने-बिछड़ने के ‘देवी’
बेक़रारी रही, करार न था

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