दिल से ग़ज़ल तक

 

सिमटती जो जाएगी लौ दर्दे-दिल की
तो किस काम आएगी लौ दर्दे-दिल की
  
जहाँ होगी सिन्फ़े-ग़ज़ल की इबादत
वहीं सर झुकाएगी लौ दर्दे-दिल की
  
करें चाहे जितनी शरारत हवाएँ
कभी बुझ न पाएगी लौ दर्दे-दिल की
 
उदासी के आँगन को शह्नाइयों के
सुरों से सजाएगी लौ दर्दे-दिल की
 
जहँ तेरी यादों का छूटेगा दामन
वहीं झिल्मिलाएगी लौ दर्दे-दिल की
 
ज़मीरों का ज़ामिन जहाँ झूठ होगा
वहीं तिलमिलाएगी लौ दर्दे-दिल की
 
जहाँ भर में होगी उजालों की बारिश
करिश्मा दिखाएगी लौ दर्दे-दिल की
 
मिनारा बनेगी जो वो रौशनी का
मक़ाम ऊँचा पाएगी लौ दर्दे-दिल की
 
न तारीक होगी मुहब्बत की राहें
अँधेरे मिटाएगी लौ दर्दे-दिल की
 
सुकूँ पा सकेगा जहाँ दर्द ‘देवी’
वहीं मुस्कराएगी लौ दर्दे-दिल की

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