दिल से ग़ज़ल तक


2122    2122    2122    212
 
मुस्कुराहट मेरी अब तो ढलते ढलते ढल गई
क़हक़हों को बात ये जाने न कब से खल गई
 
ज़िन्दगी मेरी थी, फिर भी जीने का हक़ वो ले गया
मेरी हर उम्मीद अब है उसके दिल में पल गई
 
आँखों की ख़ामोशियाँ बतिया न पाई शर्म से
मौक़ा मिलते बातों में वो बात दिल की ढल गई 
 
तेरी मेरी सोच में टकराव शिद्दत से रहा 
बल वहीं का था वहीं लेकिन वो रस्सी जल गई
 
खोटे सिक्के खोटी नीयत ले चली बाज़ार मैं 
इक चवन्नी खोटी थी वो, जाने कैसे चल गई
 
ख़ामोशी की बीच में दीवार पुख़्ता थी मगर
गुफ़्तुगू भी कम न थी, वो चाल अपनी चल गई
 
जो कहा, जिसने कहा, हर एक का माना कहा
जाने किसपे दिल ये ‘देवी’ मेरी है पागल गई

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