दिल से ग़ज़ल तक

 
221    2121    1221    212
 
साँसें जो ज़िन्दगी ने दी क्या जी रहे हैं हम
उसका उधार क्या कभी लौटा सके हैं हम
 
यूँ यक ब यक बरस पड़ीं हमपे मुसीबतें 
बिखरे हैं यूँ उजड़ के न अब तक बसे हैं हम
 
अपने ही घर में अपनों से कुछ यूँ अलग हुए
तन्हाइयों में जैसे बसर कर रहे हैं हम
 
बिछड़े जो दर-दरीचों से मिलकर गले कभी
देखा जो दूर से उन्हें तो रो पड़े हैं हम
 
‘देवी’ दबी हैं दिल की ख़लाओं में सिसकियाँ
पदचाप उनकी साँसों में सुनने लगे हैं हम

<< पीछे : 40. हैवानियत के सामने इन्सानियत… आगे : 42. बने बेवफ़ा राज़दाँ देखो कैसे >>

लेखक की कृतियाँ

बाल साहित्य कविता
ग़ज़ल
आप-बीती
कविता
साहित्यिक आलेख
कहानी
अनूदित कहानी
पुस्तक समीक्षा
बात-चीत
अनूदित कविता
पुस्तक चर्चा
विडियो
ऑडियो