दिल से ग़ज़ल तक

 
सुब्हदम तू जागरण के गीत गाती जा सबा 
जागना है देश की ख़ातिर बताती जा सबा
 
चैन से रहने नहीं देते हमें फ़िरक़ा परस्त 
पाठ उन्हें अम्नो-अमां का तू पढ़ाती जा सबा 
 
दनदनाती फिर रही है घर में गद्दारों की फ़ौज
भाईचारे की उन्हें घुट्टी पिलाती जा सबा 
 
बँट गये हैं क्यों बशर, रिश्ते सलामत क्यों नहीं
ये उठी दीवार जो उसको गिराती जा सबा
 
बेयक़ीनी से हुए हैं दिल हमारे बदगुमां 
गर्द आइनों पे छाई वो हटाती जा ज़रा 
 
उनका जलना, उनका बुझना तय करेगा तेरा रुख़ 
आस के दीपक बुझे हैं, तू जलाती जा सबा 
 
जादए-मंज़िल पे छाई तीरगी ही तीरगी 
हो सके तो इक नया सूरज उगाती जा सबा

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