दिल से ग़ज़ल तक

 

122    122    122    122
 
कहीं सर किसी का सलामत नहीं है 
कहो कैसे कह दें ये आफ़त नहीं है
 
जला दी दरिंदों ने बस्ती हमारी
जो कहते रहे उनको नफ़रत नहीं है
 
न उनका था जो कुछ, उसे अपना माना 
ये है और क्या, गर ख़यानत नहीं है
 
मेरे दिल के पन्नों पे है अक्स उसका
कहूँ कैसे दिलबर की सूरत नहीं है
 
उगे तीरगी की जड़ों में उजाले 
ये है और क्या गर इनायत नहीं है
 
रहो मंदिरों में, रहो मस्जिदों में
न दिल से करो गर इबादत नहीं है
 
धड़कता है दिल ये इनायत ख़ुदा की
ठिकाना है उसका इमारत नहीं है 
 
मैं झूठों की बस्ती में रहती हूँ ‘देवी’ 
कहूँ सच मगर ये रवायत नहीं है
 

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