दिल से ग़ज़ल तक

 

2122    2122    2122 
 
थरथराया रात भर तेरा अधर है
चांदिनी बिन जैसे तड़पा वो क़मर है
 
कौन रहता है कहाँ मुझको ख़बर है
ये न जानूँ किस गली में मेरा घर है
 
शाम से लेकर सहर तक का है जीवन  
चलते-चलते सबको तय करना सफ़र है
 
चैन से किसकी है गुज़री ज़िन्दगानी
यह बदलती करवटें शामो-सहर है
 
‘चल तू आगे मैं हूँ पीछे, तू चली चल’
मौत कहती जिंदगी से ‘कैसा डर है’
 
मीठी कड़वाहट का मिलता ज़ायका क्यों  
बातों में उसकी घुला कैसा ज़हर है
 
सारी दौलत दाव पर ‘देवी’ लगा दी
हार कर सब कुछ हुआ वो दरबदर है
 

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