दिल से ग़ज़ल तक

दिल से ग़ज़ल तक  (रचनाकार - देवी नागरानी)

60. शिल्पी ने तराशी औरत 

 

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शिल्पी ने तराशी औरत है
जो शर्मो-हया की मूरत है
 
क्या ख़ूब लगाईं क़ीमत है
जो कहता था माँ जन्नत है
 
दिल आन किनारे पर डूबा
अब तो फ़ुर्सत ही फ़ुर्सत है
 
वो जागते में ही सोया था
यह उसकी अपनी ग़फ़लत है
 
जब नींद से नाता टूट गया
ख़्वाबों से अब तो फ़ुर्सत है
 
‘देवी’ को किनारा ले डूबा
ये कैसी उसकी क़िस्मत है

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