दिल से ग़ज़ल तक

 

2122    2122    212 
 
होती बेबस है ग़रीबी क्या करें
जब ख़रीदे है अमीरी क्या करें
 
रेज़ा-रेज़ा ख़्वाब जब-जब थे हुए 
तब ख़लिश सहनी पड़ी थी क्या करें 
 
तल्ख़ियाँ छोटी बड़ी हर रोज़ की 
साथ में है बद नसीबी क्या करें
 
चेहरा पढ़ना आ गया लोगों को जब 
तब पड़ी नज़रें चुरानी क्या करें
 
उसकी फ़ितरत, मेरी फ़ितरत थी अलग 
बात बनते बनते बिगड़ी क्या करें
 
सर ढकें या पाँव अब तू ही बता 
है रिदा क़द से भी छोटी क्या करें
 
जब लकीरें सोच की मिलती नहीं
लाज़िमी तकरार ‘देवी’ क्या करें

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