दिल से ग़ज़ल तक

 

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लिखा जो तुमने क़लाम होगा
तेरी इबादत का जाम होगा
 
मैं तेरा सादिक मैं तेरा साजिद
न कोई मुझसा ग़ुलाम होगा
 
मैं अपने सिर का उतारूँ सदका
ये मेरा तुमको सलाम होगा 
 
तुम्हारी जो अहमियत है दिल में
वही तुम्हारा मुक़ाम होगा
 
समझ इबादत पढ़ूँ मैं जिसको
वही तो तेरा क़लाम होगा
 
बिछा दूँ पलकें जिस राह गुज़रो 
बहुत वो बढ़िया निज़ाम होगा 
 
नज़र चुरा कर नज़र मिलाओ
वो दिल का दिल को पयाम होगा
 
कभी जो तुम गुनगुनाओ ‘देवी’
ग़ज़ल, हमारा इनाम होगा

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