दिल से ग़ज़ल तक


122    122    122    122
 
ज़रा पत्थरो ध्यान देकर सुनो तुम 
कभी दास्ताँ ख़ामुशी की ज़ुबानी 
 
हुई शहर में सारी वीरान सड़कें 
करम दहशतों का, बड़ी मेहरबानी
 
कभी चाँदनी रात ओढ़ी है हमने
तो चादर कभी धूप की हमने तानी
 
गया जो गया, उसपे इतना न सोचो
कि बीते न उसके बिना ज़िंदगानी
 
जमाती है मजबूर पर धौंस कैसे 
ग़रीबों पे दौलत की है हुक्मरानी
 
उन्हें ‘देवी’ छेनी से मैंने तराशा 
जो सपनों को साकार करने की ठानी

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