दिल से ग़ज़ल तक

  
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कैसी ख़बरें हैं ये, क्या समाचार है
ख़ून अलूदा हर रोज़ अख़बार है
 
कैसा माहौल है, कैसा संसार है
बन गया सौदे बाज़ी का बाज़ार है
 
कश्ती पहुँचे किनारे तो कैसे कहो
नाव में छेद है, टूटी पतवार है
 
इन सुलगते हुए मंज़रों की सुनो
राख में भी निहाँ जिनके अंगार है
 
ज़िंदगी क्यों लगे मुझको बेसूद सी
क्या यही इसका मतलब यही सार है
 
वो करिश्मे जो क़ुदरत दिखाती हमें 
ये क्या उपकार है या ये उपहार है
 
हाथ में जिसके ‘देवी’ है हथियार सब 
वो है करता निहत्थे पे क्यों वार है

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