दिल से ग़ज़ल तक

 
2122    2122    212
  
अनकही जो बात दिल में रह गई 
आपकी ख़ामोशी सब कुछ कह गई 
 
कुछ न कहने की गुंजाइश ही रही 
बात जायज़ तो न थी पर सह गई 
 
थीं दरारें दिल की दीवारों पर बहुत 
प्यार के इक झोंके से सब ढह गई 
 
वो था माहिर शतरंजी इस खेल में 
चाल उसकी मात को दे शह गई 
 
कुछ न हासिल होगा ‘देवी’ था पता 
खाइशों की धार में पर बह गई

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