दिल से ग़ज़ल तक


2122    2122    2122    212
 
साँस का ईंधन जलाकर ज़िंदगी की लौ जले 
आँधियों से वो ज़माने की भला क्या बुझ सके
 
चार तिनकों से बना है ज़िंदगी का आशियाँ 
हादसों की बिजलियों से जाने कब वो जल उठे 
 
बेमुरव्वत आँधियों का क्या करे कोई भला 
मुश्किलों का सामना है कैसे फिर मंज़िल मिले
 
हम जो सपनों का महल देखा किये हैं रात-दिन
सच की चट्टानों से जाने कब वो टकरा कर गिरे
 
साज़िशें हैं, इम्तहाँ हैं, लब पे आहें, सिसकियाँ 
पर सदा सुनते न बहरे और गूँगे चुप खड़े
 
ज़िंदगी की नाव को ‘देवी’ डुबोने जो चला 
अपना दुश्मन ख़ुद बने वो डूबने से क्या बचे

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