दिल से ग़ज़ल तक

 

221    2121    1221    212
 
क्यों बात को बढ़ा के यूँ चर्चा बना दिया 
सब ने गली की दास्ताँ को क्या बना दिया 
 
यूँ दर्द मेरे दिल का क्यों अपना लिया कहो  
उस दर्द ने तुझे भी है मुझसा बना दिया
  
आई गई जो बात हुई, कल की बात थी   
क्यों आज छेड़ कर उसे मसला बना दिया 
 
माना कि तेरा मेरा कोई मेल था नहीं 
फिर भी तेरे जुनून ने तुझसा बना दिया
 
था इश्क मुश्क कुछ नहीं, अफ़वाह थी वो बस   
हर इक ज़बान ने उसे शोला बना दिया 
 
दारू दवा है कुछ नहीं, बस प्यार है इलाज  
पत्थर से दिल को आँच से शीशा बना दिया 
 
संसार का चलन भी तो ‘देवी’ अजीब है 
हर शख़्स ने नक़ाब को चेहरा बना दिया  

<< पीछे : 38. जब भी बँटवारे की सूरत आ गयी… आगे : 40. हैवानियत के सामने इन्सानियत… >>

लेखक की कृतियाँ

बाल साहित्य कविता
ग़ज़ल
आप-बीती
कविता
साहित्यिक आलेख
कहानी
अनूदित कहानी
पुस्तक समीक्षा
बात-चीत
अनूदित कविता
पुस्तक चर्चा
विडियो
ऑडियो