दिल से ग़ज़ल तक

  
यूँ अँधेरों में दीपक जलाओ
आशियानों को अपने सजाओ
 
घर जलाकर न तुम मुफ़लिसों के
जीते जी यूँ न उनको जलाओ
 
कुछ ख़राबी नहीं है जहाँ में
नेकियों के नगर जो बसाओ
 
बीज बोकर कुछ ऐसे दिलों में
प्यार की उनमें फ़सलें उगाओ
 
किस क़द्र इलत्ज़ा अश्क़ करते
इतना ज़ुल्मी न ख़ुद को बनाओ
 
देखना है सवेरा जो 'देवी'
रात का तुम ये परदा उठाओ
 

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