दिल से ग़ज़ल तक

 

2122    2122    2122    2122
 
एक तुम हो एक मैं हूँ तेरी मेरी इक कहानी 
है डगर मंज़िल बिना ये दर्द की है तर्जुमानी 
 
था क़ुसूर उसका न कोई फिर भी वो ख़ामोश था
की क़ुबूल उसने सज़ा, था शख़्स वो तो ख़ानदानी 
 
साथ उसका मुझको भारी पड़ गया कुछ ऐसे में 
ख़ुद को रखकर दाँव पर मुझको पड़ी क़ीमत चुकानी 
 
वक़्त जब जब है बदलता, साथ नज़रें हैं बदलती
ऐसे में अनजान बनकर पड़ती है नज़रें चुरानी 
 
इतने तो मायूस घर के थे न ये दीवार-ओ-दर
बीच उनके आ गई जाने कहाँ से बदगुमानी 
 
घर के बाहर बैठा दुश्मन, घर के भीतर आ गया 
दोस्ती उससे हुई, भारी पड़ी क़ीमत चुकानी 
 
पूरी खाइश हो रही है माँगने से पहले कुछ 
रहमतों की है ये बारिश, रब की है ये मेहरबानी 
 
दर्द क सैलाब ‘देवी’ बन गया है आबशार 
जो पिघल कर बह रहा है दर्दे-दिल से बनके पानी

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