दिल से ग़ज़ल तक


2122    1212    22
 
मुँह के बल फिर से गिर गया हूँ मैं 
ज़िन्दगी तुझसे डर गया हूँ मैं 
 
उसने शायर बना दिया मुझको 
ज़िक्र उसका भी कर गया हूँ मैं 
 
सब हदें पार करके जीवन की
लग रहा है गुज़र गया हूँ मैं
 
थम गया है समय कब से 
साथ उसके ठहर गया हूँ मैं 
 
आईना झूठ बोलता ही नहीं
कह रहा है सुधर गया हूँ मैं
 
कोई हलचल नहीं है दिल में अब 
जैसे ‘देवी’ ठहर गया हूँ मैं
 

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