दिल से ग़ज़ल तक

 

1212    1122    1212    22
 
उसे ले आई जो शक्ति, वो आस्था की थी
थी मौज मौजों की या वो नाख़ुदा की थी
 
ठिकाने हमने भी बदले वफ़ा के नाम कई
टिका ये दिल न कहीं, बात बेवफ़ा की थी
 
गुमाश्तगी उसे रास आये ऐसा हो न सका
फ़क़ीरी में जो मिली चाह आत्मा की थी 
 
मेरी चुपी को समझ जुर्म, दी सज़ा मुझको 
कोई बताए सज़ा थी तो, किस ख़ता की थी
 
उदास दिल को ख़ुमारी से भर दिया जिसने 
वो ख़ुशगवार सी ख़ुशबू, किस हवा की थी
 
न चाँद में, न थी तारों में, वो कशिश ‘देवी’
फ़िदा करे जो महक दिल को, दिलरुबा की थी

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