दिल से ग़ज़ल तक

 
122    122    122    122
  
नये रंग निस दिन दिखाती है आँखें 
बदल कर नये रूप भाती है आँखें
 
ये बरबस हँसाकर रुलाती है आँखें 
मगर शीशे में मुस्कराती है आँखें 
 
मिटाकर कई अक्स अक्सर पुराने 
नये रोज़ सपने सजाती है आँखें   
 
भले कुछ न कह पाये आँखों का पानी  
कही अनकही पर सुनाती है आँखें
 
ये आईना बनकर दिखाती बहुत कुछ 
कई राज़ फिर भी छिपाती है आँखें 
 
ये सच झूठ को कर दे बेपर्दा ‘देवी’
हकीक़त है क्या ये दिखाती है आँखें 
 

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