दिल से ग़ज़ल तक

 

212    212    212    212 
 
शोर में भी ख़फ़ा है ये ख़ामोशियाँ
बनके दीमक वो चाटे हैं तन्हाइयाँ
 
मेल खाती नहीं सोच की दूरियाँ
मान ली है सभी ने ये तब्दीलियाँ
 
की जवानी ने कल थीं जो गुस्ताख़ियाँ
माफ़ कैसे करूँ दिल की नादानियाँ
 
टीका-टिप्पणी कहाँ किसको भाती भला 
अब नहीं इसकी आदी जवाँ लड़कियाँ
 
कितना ख़ुदग़र्ज़ है, कितना नादान वो
आज़माइश को समझे जो दौरे-खिजाँ 
 
ज़ोर से रोने पर रोक जब हो लगी 
सुन सको तो सुनो मौन की सिसकियाँ
 
कहने को था बहुत, वो रहा चुप मगर 
इश्क़ ने उसको ‘देवी’ किया बेज़बाँ

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