दिल से ग़ज़ल तक


122    122    122    122 
 
उजालों की बारात के हैं नज़ारे
जो उतरे हैं आँगन में बनकर सितारे
 
वो सूनी सी आँखों में सपने सजे जो 
दमक कर उजालों को करते इशारे 
 
जहाँ आज हम तुम खड़े हैं यूँ मिलकर 
वहीं कल मिलेंगे ये बच्चे हमारे 
 
ये महल्ला ये गलियाँ हैं साझी हमारी
यहाँ रात दिन अब बजेंगे नगारे 
 
मिलन ये हमारा तुम्हारा है ऐसा 
करे धार जैसे, अलग दो किनारे 
 
क़दम तुम बढ़ाओ क़दम हम बढ़ायें 
बनें एक दूजे के ‘देवी’ सहारे

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