दिल से ग़ज़ल तक

 

2122    1212    22
 
शीशे के घर में जो सदा रहते 
पत्थरों से वे कभी नहीं डरते
 
करके चेहरों को बेनक़ाब यहाँ 
लोग पढ़ने से क्यों नहीं डरते
 
रिश्ते नाते हैं डोर रेशम की
वे उलझते सुलझते हैं रहते
 
टूटते हैं वफ़ा के धागे जब
कोशिशें से फिर नहीं जुड़ते
 
हो ग़ुलामी क़ुबूल जिनको वो 
क्यों सदा डर में जीते औ’ मरते
 
कोई ‘देवी’ नहीं यहाँ किसका 
जानते सब हैं, पर नहीं कहते

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