दिल से ग़ज़ल तक

 
2122    1212    22 
 
है ये अनजान सा सफ़र तो नहीं 
बैठा दिल में उसी का डर तो नहीं
 
आशियाने जो जल रहे हरसू 
ये क़यामत का है क़हर तो नहीं 
 
हाथ में सबके एक पत्थर है
काँच का ये कोई नगर तो नहीं 
  
रतजगा कर रही हूँ अरसे से
पर दिखी रात की सहर तो नहीं 
 
बीच ग़ैरों के जो उठा बैठा 
वो भी अपनों से बेख़बर तो नहीं 
 
पीछा करती रही हूँ सायों का 
ढलती सी धूप का सफ़र तो नहीं
 
तू है अनमोल ‘देवी’ बहुत 
तेरे भीतर छिपा गुहर तो नहीं

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