दिल से ग़ज़ल तक

 
ईंट-गारा हर तरफ़ है घर नज़र आता नहीं
चार दीवारी है लेकिन दर नज़र आता नहीं
 
दिल किया करते हैं घायल वो नज़र के वार से 
हाथ में जिनके कोई ख़ंजर नज़र आता नहीं
 
देखने में वो है इन्सां फिर भी पत्थर सा लगा 
कोई सुख-दुख का असर उस पर नज़र आता नहीं
 
ख़ाली क्यों लगने लगी हैं शहर की ये बस्तियाँ 
जब कोई भी, ख़ौफ़ का मंज़र नज़र आता नहीं
 
प्यार की पगडंडियाँ तो देखती हूँ ख़्वाब में
ख़ुशनुमा मंज़र मगर मुझको नज़र आता नहीं
 
दावेदारी कर रहा है इल्म की वो हर जगह
उसमें ’देवी’ प्यार का अक्षर नज़र आता नहीं

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