दिल से ग़ज़ल तक

 

अनबुझी प्यास रूह की है ग़ज़ल
ख़ुश्क होंठों की तिश्नगी है ग़ज़ल
 
नर्म अहसास मुझको देती है
धूप में चाँदनी लगी है ग़ज़ल
 
इक इबादत से कम नहीं हर्गिज़
बंदगी सी मुझे लगी है ग़ज़ल
 
बोलता है हर एक लफ़्ज़ उसका
गुफ़्तगू यूँ भी कर रही है ग़ज़ल
 
मेहराबाँ इस क़दर हुई मुझपर
मेरी पहचान बन गई है ग़ज़ल
 
उसमें हिंदोस्ताँ की खु़शबू है
अपनी धरती से जब जुड़ी है ग़ज़ल
 
उसका शृंगार क्या करूँ ‘देवी’
सादगी में भी सज रही है ग़ज़ल

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