दिल से ग़ज़ल तक

 

1222    1222    1222    1222
 
हिफाज़त में हैं उसकी सब, इनायत की वो चादर है 
नज़र आता नहीं फिर भी, नज़र उसकी सभी पर है 
 
ज़मीं पर उसको ढूँढ़ो मत, न ढूँढ़ो आसमानों में 
दिलों में है बसर उसका वो हर बन्दे के भीतर है 
 
जो है आसार तूफाँ के, घिरी गिर्दाब में कश्ती 
क़हर हरसू है बरपा औ’ मचलता सा बवंडर है 
 
ज़रूरी तो नहीं हर जंग जीती जाय लड़कर ही 
सिकंदर वो भी होता है, न जिसके हाथ ख़ंजर है
 
करे साबित जो सच को झूठ में, औ’ झूठ को सच में 
यही है ख़ासियत उसकी वो इन बातों में माहिर है 
 
वही बेहतर है जाने ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा ‘देवी’ 
जिसे इक बार मिलता आज़माइश का भी अवसर है

<< पीछे : 24. शायरी इक इबादत है आगे : 26. फिर तो सब राज़ होंगे अयाँ देख… >>

लेखक की कृतियाँ

बाल साहित्य कविता
ग़ज़ल
आप-बीती
कविता
साहित्यिक आलेख
कहानी
अनूदित कहानी
पुस्तक समीक्षा
बात-चीत
अनूदित कविता
पुस्तक चर्चा
विडियो
ऑडियो