दिल से ग़ज़ल तक

 

122    122    122    122
 
कोई बैठा मुझमें मुझे है बुलाता
वो बरबस मुझे नींद से है जगाता 
 
खुली आँख से देख पाऊँ न उसको
करूँ बंद पलकें नज़र वो है आता
 
सखा बंधु वो ही मुझे जो सँभाले
वही एक जग में है नाता निभाता 
 
समंदर है वो बूँद उसकी हूँ मैं भी
न जाने है उससे मेरा कैसा नाता
 
वो महकाये जीवन की बग़िया निरंतर 
है माली वो ऐसा जो जीवन सजाता
 
जो मेरा तुम्हारा सभी का है ‘देवी’
दिले-हाल जाने वो सब का विधाता
 

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