दिल से ग़ज़ल तक

 

2122    1212    22 
 
अपनों की दोस्ती से डरते हैं
ग़ैरों की दुश्मनी से डरते हैं
 
ख़ून विश्वास का हुआ जब से
तब से हम दोस्ती से डरते हैं
 
जीना मरना लगे समान अगर 
फिर क्यों हम ख़ुदकुशी से डरते हैं
 
इतने आदी हुए अँधेरों के 
अब तो हम रोशिनी से डरते हैं 
 
रूठने की मनाने की बीती 
उम्र, अब बेरुख़ी से डरते हैं 
 
मरने से इतना डर नहीं लगता 
जितना हम भुखमरी से डरते हैं 
 
लोग पत्थर के हो गए ‘देवी’ 
अब तो हर आदमी से डरते हैं

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