दिल से ग़ज़ल तक

 

की शायरी भी हमने सजदे में सर झुकाकर
कुछ पल को रह गये हैं ख़ुद में ही हम समाकर
 
खिलते हैं सुनने वाले, जैसे गुले-शगुफ़्ता
महबूब-सी ग़ज़ल जब पढ़ते वो मुस्कराकर
 
सहरा-सी प्यास मेरी फिर किस तरह बुझेगी
जब तिश्नगी बढ़ाए वो दूरियाँ बढ़ाकर
 
पागल चकोर की है पागल-सी बेक़रारी
बादल की ओट में जब छुपता है चाँद जाकर
 
ये भी रिवायतों का है सिलसिला पुराना
डसते वही हैं जिनको पाला लहू पिलाकर
  
है शान शाइरी की उनकी ग़ज़ल हैं कहते
वो झूठ भी हैं कहते कुछ सच में यूँ मिलाकर
 
'देवी' वो कब रुके हैं, होकर भी अबला-पा
दीवानावार चलते खारों पे सर उठाकर

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