दिल से ग़ज़ल तक

 
घरौंदे साहिलों पर जो बने हैं
वो मौजों के थपेड़ों से बहे हैं 
 
ऐ ख़ंजर सब्र कर ले तू ज़रा-सा
पुराने ज़ख़्म तो अब तक हरे हैं
 
शजर की शाख़ बेवा-सी है सूनी
ख़िजां में सारे ही पत्ते झरे हैं
 
जहाँ ख़ामोशियों ने दम है तोड़ा
वहीं रोते हुए पत्थर मिले हैं
 
उजालो जब से फेरीं तुमने आँखें
मुसलसल तीरगी के सिलसिले हैं
 
सियासत का है ये बाज़ार यारो
यहाँ तो खोटे सिक्के भी चले हैं

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