दिल से ग़ज़ल तक

 

2122    2122    2122    212 

हो न बस में तेरे कुछ गर उसकी ख़्वाइश मत करो
ओढ़ खुदगर्ज़ी की चादर फिर सताइश मत करो  
 
छल कपट दिल में हो, आँखों में उजाला झूठ का
सच के सौदागर बनो मत, कोई साज़िश मत करो 
 
जिस हुनर को तू नहीं अंजाम तक है ला सका 
सामने औरों के उसकी फिर नुमाइश मत करो
 
तुम किसीको मत समझना भूल से जागीर अपनी
अपने क़द को खुद संभालो कोई साज़िश मत करो
 
घर में फाके हों मगर मुस्कान होंठों पर लिये
हर किसी को घर बुलाने की तो कोशिश मत करो
 
रूखी सूखी ज़िन्दगी करना बसर आसां नहीं  
ले लो किस्मत से मिले जो, बस गुज़ारिश मत करो
 
कंकरों की हो चुभन जिस राह ‘देवी’ भूलकर  
पाँव तपती धूप में धरने की कोशिश मत करो 

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