दिल से ग़ज़ल तक

 
जब भी बँटवारे की सूरत आ गयी 
फिर तो बस घर में अदालत आ गयी 
 
दूध की नदियाँ लगीं बहने वहाँ
जिस जगह पे आदमीयत आ गयी
 
भाईचारा रह गया दम तोड़कर
घोलने को ज़हर, नफ़रत आ गयी
 
ख़ाक करके ही लिया दम बर्क़ ने
चार तिनकों पर क़यामत आ गयी
 
तोड़ू दस्ता और बारिश साथ-साथ
झुग्गी वालों की तो शामत आ गयी
 
हो गया नेतागिरी में उसका नाम
आज की जिसको सियासत आ गयी
 
जब अक़ीदत को ठिकाना मिल गया
दिल को ‘देवी’ तब इबादत आ गयी

<< पीछे : 37.  ईंट-गारा हर तरफ़ है घर नज़र… आगे : 39. क्यों बात को बढ़ा के यूँ चर्चा… >>

लेखक की कृतियाँ

बाल साहित्य कविता
ग़ज़ल
आप-बीती
कविता
साहित्यिक आलेख
कहानी
अनूदित कहानी
पुस्तक समीक्षा
बात-चीत
अनूदित कविता
पुस्तक चर्चा
विडियो
ऑडियो