दिल से ग़ज़ल तक


2122    1212    22 
 
बारहा उसके घर गया हूँ मैं 
मत समझना कि डर गया हूँ मैं
 
उम्र भर पी ज़हर गया हूँ मैं 
नीलकंठ जैसे बन रहा हूँ मैं 
 
थी न कोई वजह भी जाने की
जाने फिर क्यों उधर गया हूँ मैं 
 
बंद दरवाज़ा पाया जब भी गया 
अब है लगता बिखर गया हूँ मैं 
 
जाने किस बात की है रंजिश जो 
दिल से उसके उतर गया हूँ मैं
 
पूरा उतरा न ‘देवी’ वादे पर
जानता हूँ मुकर गया हूँ मैं

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