दिल से ग़ज़ल तक

 
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लिखी बात दिल की ग़ज़ल के बहाने
वही फिर सुना दी ग़ज़ल के बहाने
 
ज़ुबाँ पर न जो ला सके बात दिल की 
वही खुलके लिख दी ग़ज़ल के बहाने
 
लिखी मैंने काग़ज़ पे तहरीर दिल की
बनी शायरी वो ग़ज़ल के बहाने
 
लिखा जो, पढ़ा ख़ुशनुमा महफ़िलों में
वहीं दाद पायी ग़ज़ल के बहाने 
 
थी दरिया दिली उसकी जिसने सिखा कर 
मेरी झोली भर दी ग़ज़ल के बहाने
 
गुलों पे जो मँडराते भंवरों को देखा 
कली मुस्कुराई ग़ज़ल के बहाने
 
वो तेरे मेरे बीच की इक कड़ी है, 
है पुख़्ता अभी भी ग़ज़ल के बहाने 
 
लगी होड़ उसकी व मेरी थी ‘देवी’
वो जीता था बाज़ी ग़ज़ल के बहाने
 

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