दिल से ग़ज़ल तक

 
नया रंग हो नया ढंग हो, नई आस और उमंग हो
‘नए साल में नए गुल खिलें, नई हो महक नया रंग हो’
 
मुझे राहतों की जो छाँव दे, कोई ऐसा भी तो शजर मिले
मेरी रूह को जो सुकून दे, वहाँ बज रहा कोई चंग हो
 
मेरे ज़ख़्म भर के सुकून दे, कोई साज़ ऐसा भी छेड़ दे
जो बजा सके मेरा साज़े-दिल, कोई ऐसा मस्त मलंग हो
 
मेरा आसमाँ भी, ज़मीं भी तू, मेरी रूह, मेरा वुजूद तू
मेरी मुश्किलों को पनाह दे, तेरे रंग में मेरा रंग हो
 
न हो माँग सूनी न गोद हो, न जुदा हो कोई फ़साद में
है दुआ में मेरी असर अगर, न हों हादिसे न ही जंग हो
 
तू मना ले रब को ऐ ज़िंदगी, तेरी साँस साँस में बंदगी
न लगन ये टूटे कभी तेरी, बँधी डोर से वो पतंग हो

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