दिल से ग़ज़ल तक

 
2122    2122    212
 
तेरे मेरे बीच वो नाता न था 
दर्द भी अपना कभी साझा न था 
 
ज़ख़्म रिस रिस के बहा सूखा न था 
छू के देखा तो लगा ताज़ा न था 
 
कोशिशें की थीं बहुत पर खुल गयी 
पुख़्तगी से गाँठ को बाँधा न था 
 
उधड़ी चादर वो रफ़ू तो हो गई 
मेल खाए ऐसा पर धागा न था 
 
रात आधी चाँद आधा था मगर 
चाँदनी का प्यार तो आधा न था
 
जो मिला मौक़ा वो निकला हाथ से 
हमने ही कोई सिरा थामा न था 
 
उसकी मेरी दोस्ती में थी सुलह 
साथ देने का कोई वादा न था 
 
राह में वो छोड़ कर 'देवी' चला
तब हुआ मालूम वो अपना न था

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