दिल से ग़ज़ल तक

 
वो ही चला मिटाने नामो-निशाँ हमारा
जो आज तक रहा था जाने-जहाँ हमारा
 
दुश्मन से जा मिला है अब बाग़बाँ हमारा
सैयाद बन गया है लो राज़दाँ हमारा
 
ज़ालिम के ज़ुल्म का भी किससे गिला करें हम
कोई तो आ के सुनता दर्द-ए-निहाँ हमारा
 
हर बार क्यों नज़र है बर्क़े-तपाँ की हम पर
हर बार ही निशाना क्यों आशियाँ हमारा
 
दुश्मन का भी भरोसा हमने कभी न तोड़ा
बस उस यक़ीं पे चलता है कारवाँ हमारा
 
बहरों की बस्तियों में हम चीख़ कर करें क्या
चिल्लाना-चीख़ना सब है रायगाँ हमारा
 
कुछ पर कटे परिंदे हसरत से कह रहे हैं
‘देवी’ नहीं रहा अब ये आसमां हमारा
 

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