दिल से ग़ज़ल तक


2122    2122    2122 
 
ख़ाली दिल का मकान था फिर भी
कुछ न किसको पता चला फिर भी। 
 
थी तो अनजान ख़ौफ़ की आहट 
दिल धड़कता रहा मिरा फिर भी
 
याद की क़ैद में परिन्दा था 
कर दिया है उसे रिहा फिर भी 
 
था किया इन्तिज़ार हमने बहुत 
वक़्त जैसे ठहर गया फिर भी
 
आदमी पा रहा बहुत कुछ है
आदमीयत वो खो रहा फिर भी
 
आज़माइश पे पूरे उतरे तुम
इम्तिहाँ वक़्त ने लिया फिर भी
 
ख़ुद ख़ताओं का है पुलिंदा जो 
दोष ‘देवी’ को दे रहा फिर भी

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