दिल से ग़ज़ल तक

 

2122    2122    2122    212
 
मुंतशिर हो ज़ेहन तो फिर कैसे कुछ लिख पाओगे
मन की मैना चुप रही तो गीत कैसे गाओगे
 
ज़िंदगी से सुलह कर लो वर्ना तुम पछताओगे
बाँध कर क्या हसरतों को तुम कभी सुख पाओगे
 
बेगुनह अब भी खड़ा है उन गुनाहगारों के बीच
बेगुनाही उसकी साबित क्या कभी कर पाओगे? 
 
देखकर ग़म के अँधेरे तुम तो घबराए बहुत
हौसला रख कर उजाले किस तरह फिर लाओगे
 
ख़्वाहिश-ए-दामन में तुमने छेद कितने कर दिए
इस फटे दामन में कैसे, ख्वाइशें भर पाओगे
 
आईने के सामने बेदाग़ तुम भी तो नहीं
तुम घिनौनी हरक़तों से बाज़ तुम कब आओगे
 
कोशिशें नाकाम होती है अगरचे फिर कहो 
इस अधूरी ज़िदगी में किस तरह जी पाओगे
 
झूठ के शोले जलाते सच को 'देवी' जब कभी
दूर रहना उनसे वर्ना आग में जल जाओगे
 

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