दिल से ग़ज़ल तक


1222    1222    1222    1222
 
अँधेरी सी गली में कौन जाने घर ये किसका है 
कभी लगता है मेरा है, कभी लगता है तेरा है। 

 

मुसाफ़िर हो क्यों ग़फ़लत की गुफाओं में भटकते हो 
उठो जागो, समझ लो ये सदाक़त का सवेरा है 

 

न रोशनदान इक भी है जो घर में रोशनी लाये 
अँधेरा है, क़ुसूर इसमें न तेरा है न मेरा है

 

हुआ अरसा न आहट आज तक मैं सुन सकी सच की 
मुखौटा झूठ का ओढ़े कोई आया लुटेरा है 

 

है उठता ज्वार भाटा मेरे दिल में आजकल अक्सर
है लगता धड़कनों को इक बवंडर ने आ घेरा है 

 

फँसे हो जाल में ऐसे विकारों के कि मत पूछो 
जहाँ तक है नज़र जाती दिखे दुश्मन का घेरा है

 

सुबह से शाम तक का है सफ़र यह ज़िन्दगी ‘देवी’ 
जहाँ साँसें लगे ढलने समझ लेना वो डेरा है
 

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