दिल से ग़ज़ल तक

 

जब भी बढ़ता है ग़म पास आती ग़ज़ल
गुदगुदा कर है मुझको हँसाती ग़ज़ल
 
जुगनुओं से भी उसको मिली रोशनी
तीरगी में भी है झिलमिलाती ग़ज़ल
 
धूप में, छाँव में, बारिशों में कभी
तो कभी चाँदनी में नहाती ग़ज़ल
 
कैसी ख़ुश्बू है ये उसकी गुफ़्तार में
रंगों-बू को चमन में लजाती ग़ज़ल
 
जब भी मुझको सताती हैं तन्हाइयाँ
मेरी इमदाद को दौड़ी आती ग़ज़ल
 
उससे हट के कभी पढ़ के देखो ज़रा
कैसे फिर देखना रूठ जाती ग़ज़ल
 
दोनों रहते हैं ख़ामोश काग़ज़, क़लम 
जब मेरी सोच को थपथपाती ग़ज़ल
 
मैले हाथों से छूना न ‘देवी’ इसे
मैली होने से बचती-बचाती ग़ज़ल

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